Wednesday, October 30, 2019

यशवंत सिन्हा की नरेंद्र मोदी से क्यों नहीं बनी?

1991 के लोकसभा चुनाव की बात है. पटना में चंद्रशेखर सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा जब चुनाव प्रचार करके लौटे तो उन्होंने अपने घर के बाहर अपने समर्थकों के बीच वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी को अपना इंतज़ार करते पाया.
वो उनके हस्ताक्षर के लिए एक फ़ाइल ले कर आए थे. भारत की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए चंद्रशेखर और यशवंत सिन्हा ने तय किया था कि भारतीय रिज़र्व बैंक में रखे 20 टन सोने को बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में गिरवी रखेगा ताकि विदेशी भुगतान के लिए ज़रूरी 40 करोड़ डॉलर जुटाए जा सकें.
यशवंत सिन्हा ने फ़ाइल पर दस्तख़त कर उसे प्रधानमंत्री के लिए 'मार्क' कर दिया. उस दिन उन्होंने अपने आपसे प्रण किया कि अगर उन्हें मौका मिला तो वो भारत को आर्थिक रूप से इतना शक्तिशाली बनाएंगे कि भारत दूसरे देशों से कर्ज़ लेने के बजाए उन्हें कर्ज़ देगा.
सात साल बात ये मौका आया जब अटल बिहारी वाजपेई ने यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया.
यशवंत सिन्हा 1960 में आईएएस के लिए चुने गए और पूरे भारत में उन्हें 12वाँ स्थान मिला. आरा और पटना में काम करने के बाद उन्हें संथाल परगना में डिप्टी कमिश्नर के तौर पर तैनात किया गया.
उस दौरान बिहार के मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा ने वहाँ का दौरा किया और यशवंत सिन्हा की उनसे झड़प हो गई.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'वहाँ खड़े कुछ लोग मुख्यमंत्री से अपनी शिकायत करने लगे. हर शिकायत के बाद मुख्यमंत्री मेरी तरफ़ मुड़ते और मुझसे स्पष्टीकरण माँगते.'
'मैं हर संभव उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश करता. लेकिन उनके साथ आए सिंचाई मंत्री जो कि कम्युनिस्ट पार्टी से थे, मेरे प्रति आक्रमक होते चले गए. आखिरकार मेरा धैर्य जवाब दे गया और मैंने मुख्यमंत्री की तरफ़ देख कर कहा, 'सर मैं इस व्यवहार का आदी नहीं हूँ.'
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, 'मुख्यमंत्री मुझे दूसरे कमरे में ले गए और स्थानीय एसपी और डीआईजी के सामने मुझसे कहा कि मुझे इस तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए था.'
'मैंने जवाब दिया कि आपके मंत्री को भी मेरे साथ इस तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए था. इस पर महामाया प्रसाद सिन्हा गर्म हो गए और उन्होंने मेज़ पर ज़ोर से हाथ मार कर कहा कि 'आपकी बिहार के मुख्यमंत्री से इस तरह बात करने की हिम्मत कैसे हुई?' आप दूसरी नौकरी की तलाश शुरू कर दीजिए.'
'मैंने कहा, 'मैं शरीफ़ आदमी हूँ और चाहता हूँ कि मुझसे शराफ़त से पेश आया जाए. जहाँ तक दूसरी नौकरी ढूंढने की बात है, मैं एक दिन मुख्यमंत्री बन सकता हूँ, लेकिन आप कभी आईएस अफ़सर नहीं बन सकते. मैंने अपने कागज़ उठाए और कमरे से बाहर निकल आया.'
थोड़े दिनों बाद यशवंत सिन्हा का पटना तबादला कर दिया गया. मुख्यमंत्री के साथ उनकी नोकझोंक की ख़बर पूरे बिहार में फैल गई. कुछ दिनों के बाद यशवंत सिन्हा को पश्चिम जर्मनी के भारतीय दूतावास में फ़र्स्ट सेक्रेट्री के तौर पर भेजा गया.
उसी दौरान भारत के वाणिज्य मंत्री ललित नारायण मिश्र ने अपने स्पेशल असिस्टेंट एनके सिंह के साथ जो कि बाद में वित्त आयोग के अध्यक्ष बने, पश्चिम जर्मनी का दौरा किया.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'उस समय मैं वहाँ वाणिज्य का काम देखता था. लंदन से एनके सिंह का मेरे पास फ़ोन आया कि ललित बाबू दिल्ली जाते हुए फ़्रैंकफ़र्ट में कुछ देर रुकेंगे. उनको जर्मन चश्मे के फ़्रेमों का बहुत शौक है.'
'आप बाज़ार से जा कर उनके लिए कुछ फ़्रेम खरीद लीजिए. जब मैं फ़्रेम खरीदने गया तो मुझे पता चला कि वो बहुत मँहगे हैं. फिर भी मैंने वो फ़्रेम खरीद लिए. जब मैंने हवाई जहाज़ के अंदर जा कर उनको वो फ़्रेम दिए तो उन्हें वो बहुत पसंद आए लेकिन मुझे ये चिंता खाए जा रही थी कि मंत्री महोदय उनका भुगतान करेंगे भी या नहीं.'
'काफ़ी देर बातचीत के बाद भी उन्होंने पैसों का कोई ज़िक्र नहीं किया. मैंने मन ही मन सोच लिया कि मुझे मेरे पैसे अब नहीं मिलने वाले. लेकिन जैसे ही विमान के चलने की घोषणा हुई और मैं विमान के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने लगा, ललित नारायण मिश्रा ने मुझसे पूछा इन फ़्रेमों के लिए कितने पैसे देने पड़े आपको?
'मैंने तुरंत उनका दाम बताया. मिश्र ने एनके सिंह से कहा कि मुझे उसके बराबर भुगतान अमरीकी डॉलर में कर दें. आख़िर में मुझे उससे भी ज़्यादा पैसे मिले जितने मैंने ख़र्च किए थे.'
'मैंने वो डॉलर फ़ौरन अपनी जेब में रखे और अपनी ख़ैर मनाता हुआ विमान से नीचे उतर गया. मेरे कहने का मतलब ये था कि राजनेता हमेशा आपको निराश नहीं करते. '
जर्मनी से लौटने के बाद उन्हें वापस बिहार भेजा गया और बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने उन्हें अपना प्रधान सचिव नियुक्त किया.
दिलचस्प बात ये थी कि मुख्यमंत्री सचिवालय में मुख्यमंत्री के सचिव के लिए तो एक कमरा था, लेकिन खुद मुख्यमंत्री के लिए कोई कमरा नहीं था. जब भी वो सचिवालय आते, वो सिन्हा की ही मेज़ और कुर्सी पर बैठकर अपना काम करते.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. उनके साथ काम करके बहुत आनंद आया. ये सही है कि वो बहुत ही अव्यवस्थित व्यक्ति थे. वो हमेशा लोगों से घिरे रहते थे और उनके पास सरकारी कामकाज के लिए कोई वक्त नहीं रहता था.'
'हमने तय किया कि हम हर दिन उन्हें पटना के किसी डाक बंगले में ले जाएंगे, जहाँ वो शाँति से फ़ाइलों पर दस्तख़त कर सकें. हम उन्हें अक्सर बिहार मिलिट्री पुलिस के फुलवारी शरीफ़ वाले गेस्ट हाउज़ ले जाते थे जहाँ कोई उनसे मिलने नहीं पहुंच सकता था.'
'वो अपनी पत्नी को गाँव में ही रखते थे. एक बार मुझे उनके गाँव जाने का मौका मिला था. वहाँ पर हमारे बैठने के लिए एक कुर्सी तक नहीं थी. उन्होंने ज़ोर दिया कि हम चाय पी कर जाएं. उन्होंने अपने हाथों से लकड़ी के चूल्हे में चाय बनाई. वो झोपड़ी में रहती थीं जहाँ आधुनिक जीवन की कोई भी चीज़ मौजूद नहीं थी.'
यशवंत सिन्हा आगे याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े हिंदी दाँ थे. उनके ज़माने में हर सरकारी काम हिंदी में किया जाता था, हाँलाकि उन्हें खुद अच्छी अंग्रेज़ी आती थी. केंद्रीय मंत्रियों और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भेजा जाने वाला हर पत्र हिंदी में होता था, लेकिन साथ ही उसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी भेजा जाता था.'
इतने महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद यशवंत सिन्हा आईएएस से इस्तीफ़ा दे कर जनसेवा करने का फ़ैसला किया. वो जयप्रकाश नारायण से बहुत प्रभावित थे, लेकिन जेपी चाहते थे कि वो तब तक आईएएस से इस्तीफ़ा न दें, जब तक उनकी आजीविका का प्रबंध न हो जाए.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'मुझे निराशा हुई जिस तरह दुमका में मेरे साथ मुख्यमंत्री ने व्यवहार किया था. मुझे लोगों ने मेरी बाक़ी ज़िम्मेदारियों के साथ ये कह कर कि एशियाई खेल आ रहे हैं दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन का अध्यक्ष बना दिया. फिर वहाँ एक नेता आ गए. उन्होंने वहाँ की फ़िज़ा बिगाड़ दी.'
'उनसे हमारी पटी भी नहीं. नतीजा ये हुआ कि वहाँ हड़ताल हो गई और मेरे लिए वो तैनाती ज़बरदस्ती गले का बोझ बन गई. इससे भी मुझे बहुत निराशा हुई. आईएएस में अक्सर होता है कि कोई भी नेता आपके साथ दुर्व्यवहार कर सकता है और आप 'पब्लिकली' उसके ख़िलाफ़ बोल नहीं सकते हैं.'
'ये सब सोच कर मैंने तय किया कि अब आईएएस छोड़ देते हैं. तब तक मेरे बच्चे 'सेटल' हो गए थे, बेटी की शादी हो गई थी और मैं पेंशन पाने के योग्य भी हो गया था. मेरी तब 12 साल की नौकरी बची थी. मैंने आईएएस से इस्तीफ़ा दे दिया.'

Tuesday, October 8, 2019

जय श्रीराम ना कहने पर पीटाः क्या है पूरा मामला?

'वो दो लोग थे. दोनों शराब के नशे में थे. हमें गालियां दी, बेइज्ज़त किया और बार-बार जय श्री राम बोलने के लिए कहते रहे, हमें मुल्क का ग़द्दार कहा गया. हमारे साथ घर की एक महिला सदस्य भी थी, वे उनकी तरफ़ अश्लील इशारे करते रहे' यह कहते हुए हरियाणा में नूंह के रईस ख़ान भावुक हो गए.
राजस्थान में अलवर के केंद्रीय बस अड्डे पर शनिवार रात हुई इस घटना के बाद मौक़े पर पहुंची पुलिस ने दो लोगों को गिरफ़्तार किया है. पुलिस ने वंश भारद्वाज और सुरेंद्र भाटिया के ख़िलाफ़ संगीन धाराओं में मुक़दमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.
पुलिस के मुताबिक़, गिरफ़्तार किये गए दोनों लोगो का किसी संगठन से संबध नहीं है लेकिन वंश भारद्वाज के ख़िलाफ़ आपराधिक मामलों का इतिहास रहा है. इन दोनों को रविवार के दिन न्यायिक अधिकारी के समक्ष पेश किया गया था जहां से उन्हें 18 अक्तूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.
अलवर में ये घटना उस समय हुई है जब रईस ख़ान अपने घर परिवार की एक महिला सदस्य और एक बच्चे के साथ नूंह जाने के लिए बस अड्डे पहुंचे.
वे बस का इंतज़ार कर रहे थे. तभी दो लोग आये और उनसे बदसलूकी करने लगे. रईस कहते हैं, ''वे नशे में थे. उन्होंने हमें जय श्रीराम बोलने को कहा. हम सर झुका कर सुनते रहे. जब नहीं बोले तो कहा तुम वतन के ग़द्दार हो. भद्दी गालियां दी. हद तो तब हो गई जब वो अर्ध नग्न होकर हमारे परिवार की महिला सदस्य के सामने अश्लील इशारे करने लगे.''
रईस ख़ान कहते हैं, ''उस वक्त काफ़ी भीड़ थी. पर कोई बीच में नहीं बोला. मगर एक चाय वाले ने उन्हें रोकने की कोशिश की, पर वो नहीं माने. हम मिन्नतें करते रहे. हमारी इज्ज़त की धज्जियां उड़ती रहीं. तभी एक व्यक्ति आया जो सेना से था. उसने उन दोनों को रोका और वहां तमाशबीन बनी भीड़ से भी कहा 'आप सब बुज़दिल हो. ये चाय वाला बोल रहा है, आप लोग इस नाइंसाफ़ी पर चुप हो. शर्मानक है.''
रईस ख़ान कहते हैं, ''वो फ़रिश्ते की तरह आया और हमसे कहने लगा 'मैं सेना में हूं. मैं भी हिन्दू हूं, जो कुछ हुआ है, मैं उसके लिए माफ़ी मांगता हूं. इन्हीं जैसे लोगों की वजह से भारत बदनाम होता है.''
रईस ख़ान ने बीबीसी से कहा, ''सेना के उस व्यक्ति ने उन दोनों को क़ाबू में किया और फिर पुलिस को ख़बर दी गई. पुलिस ने उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया. हम कार्रवाई नहीं करना चाहते थे क्योंकि पहले रकबर मारा जा चुका है और भी मारे गए हैं. दो दिन मीडिया में हल्ला मचता है और फिर बात ख़त्म. लेकिन पुलिस का व्यवहार काफ़ी अच्छा था. हमे पुलिस ने तस्सली दी और मदद का भरोसा दिलाया है.''
अलवर महिला थाने की थानाधिकारी चौथ मल वर्मा ने बीबीसी को बताया कि दोनों के ख़िलाफ़ दंड संहिता की धारा 386 यानि मृत्यु या गंभीर आघात का डर पैदा कर वसूली करना और दफ़ा 295 के तहत धार्मिक भावना को आहत करने का मामला बनाया गया है.
इन धाराओं में जुर्म साबित होने पर दस साल तक की सज़ा हो सकती है. इसके आलावा महिला की निजता का अतिक्रमण और मारपीट का मामला भी दर्ज किया गया है.
नूंह के रईस ख़ान अपने पारिवार के साथ एक शादी समारोह में शिरकत करने आये थे. वे कहते हैं कि इस घटना से शादी की ख़ुशियां काफ़ूर हो गईं.
दसवीं जमात पास 24 साल के रईस ख़ान कहते हैं, ''मैं जितना समझता हूं, भगवान राम दुनिया में अच्छाई का संदेश लेकर आये थे. मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या कभी कोई भगवान ऐसा बुरा सलूक करने के लिए कहते हैं. मुझे बहुत दुःख हुआ जब लोग यह सब देखते रहे और बचाव में आगे नहीं आये. मगर मैं सेना के उस व्यक्ति और चाय वाले का आभारी हूं जिन्होंने विपत्ति की घड़ी में अपना फ़र्ज़ निभाया और मदद की. अफ़सोस है कि मैं उन मददगारों का नाम भी नहीं पूछ पाया.''
रईस ख़ान कहते हैं कि उनके परिवार की महिला ने जब उन दोनों को मानवता का वास्ता दिया और ऐसा न करने को कहा तब उनमें से एक अर्ध नग्न हो कर सामने आ गया और गंदे इशारे करने लगा. मुझे लगा कि अगर मैंने विरोध किया तो भीड़ हमारे ऊपर टूट पड़ेगी. पर तभी वो सेना का आदमी बचाव में आ खड़ा हुआ और दोनों को फटकार लगाई.
रईस कहते हैं कि देश के नेता कहते हैं, ''बेटी बचाओ, पर क्या ऐसे बेटी बचेगी?'
रईस ख़ान को यह समझ में नहीं आ रहा है कि आख़िर अचानक क्या हो गया कि हमसे हमारी वतन परस्ती पर सवाल पूछे जाने लगे हैं.
रईस ख़ान कहते हैं वो भी उतने ही भारतीय हैं जितने दूसरे.
वे कहने लगे, ''मैं अपने वतन के लिए अपनी जान का नज़राना भी पेश कर सकता हूं. देश की आज़ादी के लिए मुसलमानों ने भी सर कटवाए हैं फिर हमसे क्यों हिसाब मांगा जा रहा है.''
रईस कहते हैं उन लोगो ने हमें देशद्रोही कहा. वो कह रहे थे तुम ग़द्दार हो. पर मैं उन्हें कहना चाहता हूं कि मैं अपने वतन के लिए मर सकता हूं, जान दे सकता हूं मगर वो मुक्का तान कर कह रहा था बोल जय श्री राम. उन्हें पता होना चाहिए था कि भगवान राम तो बुराई मिटाने आये थे.
राजस्थान में अलवर ज़िला ऐसी घटनाओं के लिए संवेदनशील रहा है. इससे पहले वर्ष 2017 में एक उन्मादी भीड़ ने कथित रूप से गौ रक्षा के नाम पर पहलू ख़ान की पीट पीट कर हत्या कर दी थी. इस मामले में मुक़दमा चला पर सभी आरोपी बरी हो गए.
बीते साल ऐसी ही एक घटना में भीड़ ने कथित रूप से गौ तस्करी का आरोप लगा कर रकबर ख़ान को मौत की नींद सुला दी. राज्य सरकार ने दो माह पहले ही मॉब लिंचिंग रोकने के लिए नया क़ानून बनाया है. इसके तहत दोषी पाए जाने पर उम्र क़ैद की सज़ा का प्रावधान किया गया है.