1991 के लोकसभा चुनाव की बात है. पटना में चंद्रशेखर सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा जब चुनाव प्रचार
करके लौटे तो उन्होंने अपने घर के बाहर अपने समर्थकों के बीच वित्त
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी को अपना इंतज़ार करते पाया.
वो उनके हस्ताक्षर के लिए एक फ़ाइल ले कर आए थे. भारत की दयनीय आर्थिक स्थिति को
देखते हुए चंद्रशेखर और यशवंत सिन्हा ने तय किया था कि भारतीय रिज़र्व बैंक
में रखे 20 टन सोने को बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में गिरवी रखेगा ताकि विदेशी
भुगतान के लिए ज़रूरी 40 करोड़ डॉलर जुटाए जा सकें. यशवंत सिन्हा ने फ़ाइल पर दस्तख़त कर उसे प्रधानमंत्री के लिए 'मार्क' कर दिया. उस दिन उन्होंने अपने आपसे प्रण किया कि अगर उन्हें मौका मिला तो वो भारत को आर्थिक रूप से इतना शक्तिशाली बनाएंगे कि भारत दूसरे देशों से कर्ज़ लेने के बजाए उन्हें कर्ज़ देगा.
सात साल बात ये मौका आया जब अटल बिहारी वाजपेई ने यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया.
यशवंत सिन्हा 1960 में आईएएस के लिए चुने गए और पूरे भारत में उन्हें 12वाँ स्थान मिला. आरा और पटना में काम करने के बाद उन्हें संथाल परगना में डिप्टी कमिश्नर के तौर पर तैनात किया गया.
उस दौरान बिहार के मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा ने वहाँ का दौरा किया और यशवंत सिन्हा की उनसे झड़प हो गई.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'वहाँ खड़े कुछ लोग मुख्यमंत्री से अपनी शिकायत करने लगे. हर शिकायत के बाद मुख्यमंत्री मेरी तरफ़ मुड़ते और मुझसे स्पष्टीकरण माँगते.'
'मैं हर संभव उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश करता. लेकिन उनके साथ आए सिंचाई मंत्री जो कि कम्युनिस्ट पार्टी से थे, मेरे प्रति आक्रमक होते चले गए. आखिरकार मेरा धैर्य जवाब दे गया और मैंने मुख्यमंत्री की तरफ़ देख कर कहा, 'सर मैं इस व्यवहार का आदी नहीं हूँ.'
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, 'मुख्यमंत्री मुझे दूसरे कमरे में ले गए और स्थानीय एसपी और डीआईजी के सामने मुझसे कहा कि मुझे इस तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए था.'
'मैंने जवाब दिया कि आपके मंत्री को भी मेरे साथ इस तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए था. इस पर महामाया प्रसाद सिन्हा गर्म हो गए और उन्होंने मेज़ पर ज़ोर से हाथ मार कर कहा कि 'आपकी बिहार के मुख्यमंत्री से इस तरह बात करने की हिम्मत कैसे हुई?' आप दूसरी नौकरी की तलाश शुरू कर दीजिए.'
'मैंने कहा, 'मैं शरीफ़ आदमी हूँ और चाहता हूँ कि मुझसे शराफ़त से पेश आया जाए. जहाँ तक दूसरी नौकरी ढूंढने की बात है, मैं एक दिन मुख्यमंत्री बन सकता हूँ, लेकिन आप कभी आईएस अफ़सर नहीं बन सकते. मैंने अपने कागज़ उठाए और कमरे से बाहर निकल आया.'
थोड़े दिनों बाद यशवंत सिन्हा का पटना तबादला कर दिया गया. मुख्यमंत्री के साथ उनकी नोकझोंक की ख़बर पूरे बिहार में फैल गई. कुछ दिनों के बाद यशवंत सिन्हा को पश्चिम जर्मनी के भारतीय दूतावास में फ़र्स्ट सेक्रेट्री के तौर पर भेजा गया.
उसी दौरान भारत के वाणिज्य मंत्री ललित नारायण मिश्र ने अपने स्पेशल असिस्टेंट एनके सिंह के साथ जो कि बाद में वित्त आयोग के अध्यक्ष बने, पश्चिम जर्मनी का दौरा किया.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'उस समय मैं वहाँ वाणिज्य का काम देखता था. लंदन से एनके सिंह का मेरे पास फ़ोन आया कि ललित बाबू दिल्ली जाते हुए फ़्रैंकफ़र्ट में कुछ देर रुकेंगे. उनको जर्मन चश्मे के फ़्रेमों का बहुत शौक है.'
'आप बाज़ार से जा कर उनके लिए कुछ फ़्रेम खरीद लीजिए. जब मैं फ़्रेम खरीदने गया तो मुझे पता चला कि वो बहुत मँहगे हैं. फिर भी मैंने वो फ़्रेम खरीद लिए. जब मैंने हवाई जहाज़ के अंदर जा कर उनको वो फ़्रेम दिए तो उन्हें वो बहुत पसंद आए लेकिन मुझे ये चिंता खाए जा रही थी कि मंत्री महोदय उनका भुगतान करेंगे भी या नहीं.'
'काफ़ी देर बातचीत के बाद भी उन्होंने पैसों का कोई ज़िक्र नहीं किया. मैंने मन ही मन सोच लिया कि मुझे मेरे पैसे अब नहीं मिलने वाले. लेकिन जैसे ही विमान के चलने की घोषणा हुई और मैं विमान के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने लगा, ललित नारायण मिश्रा ने मुझसे पूछा इन फ़्रेमों के लिए कितने पैसे देने पड़े आपको?
'मैंने तुरंत उनका दाम बताया. मिश्र ने एनके सिंह से कहा कि मुझे उसके बराबर भुगतान अमरीकी डॉलर में कर दें. आख़िर में मुझे उससे भी ज़्यादा पैसे मिले जितने मैंने ख़र्च किए थे.'
'मैंने वो डॉलर फ़ौरन अपनी जेब में रखे और अपनी ख़ैर मनाता हुआ विमान से नीचे उतर गया. मेरे कहने का मतलब ये था कि राजनेता हमेशा आपको निराश नहीं करते. '
जर्मनी से लौटने के बाद उन्हें वापस बिहार भेजा गया और बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने उन्हें अपना प्रधान सचिव नियुक्त किया.
दिलचस्प बात ये थी कि मुख्यमंत्री सचिवालय में मुख्यमंत्री के सचिव के लिए तो एक कमरा था, लेकिन खुद मुख्यमंत्री के लिए कोई कमरा नहीं था. जब भी वो सचिवालय आते, वो सिन्हा की ही मेज़ और कुर्सी पर बैठकर अपना काम करते.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. उनके साथ काम करके बहुत आनंद आया. ये सही है कि वो बहुत ही अव्यवस्थित व्यक्ति थे. वो हमेशा लोगों से घिरे रहते थे और उनके पास सरकारी कामकाज के लिए कोई वक्त नहीं रहता था.'
'हमने तय किया कि हम हर दिन उन्हें पटना के किसी डाक बंगले में ले जाएंगे, जहाँ वो शाँति से फ़ाइलों पर दस्तख़त कर सकें. हम उन्हें अक्सर बिहार मिलिट्री पुलिस के फुलवारी शरीफ़ वाले गेस्ट हाउज़ ले जाते थे जहाँ कोई उनसे मिलने नहीं पहुंच सकता था.'
'वो अपनी पत्नी को गाँव में ही रखते थे. एक बार मुझे उनके गाँव जाने का मौका मिला था. वहाँ पर हमारे बैठने के लिए एक कुर्सी तक नहीं थी. उन्होंने ज़ोर दिया कि हम चाय पी कर जाएं. उन्होंने अपने हाथों से लकड़ी के चूल्हे में चाय बनाई. वो झोपड़ी में रहती थीं जहाँ आधुनिक जीवन की कोई भी चीज़ मौजूद नहीं थी.'
यशवंत सिन्हा आगे याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े हिंदी दाँ थे. उनके ज़माने में हर सरकारी काम हिंदी में किया जाता था, हाँलाकि उन्हें खुद अच्छी अंग्रेज़ी आती थी. केंद्रीय मंत्रियों और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भेजा जाने वाला हर पत्र हिंदी में होता था, लेकिन साथ ही उसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी भेजा जाता था.'
इतने महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद यशवंत सिन्हा आईएएस से इस्तीफ़ा दे कर जनसेवा करने का फ़ैसला किया. वो जयप्रकाश नारायण से बहुत प्रभावित थे, लेकिन जेपी चाहते थे कि वो तब तक आईएएस से इस्तीफ़ा न दें, जब तक उनकी आजीविका का प्रबंध न हो जाए.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'मुझे निराशा हुई जिस तरह दुमका में मेरे साथ मुख्यमंत्री ने व्यवहार किया था. मुझे लोगों ने मेरी बाक़ी ज़िम्मेदारियों के साथ ये कह कर कि एशियाई खेल आ रहे हैं दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन का अध्यक्ष बना दिया. फिर वहाँ एक नेता आ गए. उन्होंने वहाँ की फ़िज़ा बिगाड़ दी.'
'उनसे हमारी पटी भी नहीं. नतीजा ये हुआ कि वहाँ हड़ताल हो गई और मेरे लिए वो तैनाती ज़बरदस्ती गले का बोझ बन गई. इससे भी मुझे बहुत निराशा हुई. आईएएस में अक्सर होता है कि कोई भी नेता आपके साथ दुर्व्यवहार कर सकता है और आप 'पब्लिकली' उसके ख़िलाफ़ बोल नहीं सकते हैं.'
'ये सब सोच कर मैंने तय किया कि अब आईएएस छोड़ देते हैं. तब तक मेरे बच्चे 'सेटल' हो गए थे, बेटी की शादी हो गई थी और मैं पेंशन पाने के योग्य भी हो गया था. मेरी तब 12 साल की नौकरी बची थी. मैंने आईएएस से इस्तीफ़ा दे दिया.'