Thursday, September 27, 2018

हत्या का 19 साल पुराना मामला जिससे परेशान हैं योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को महराजगंज की सत्र अदालत ने 19 साल पुराने एक मामले में नोटिस भेजा है और एक हफ़्ते के भीतर नोटिस का जवाब देने को कहा है.
मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी. हालांकि, इस मामले को महराजगंज की ही सीजेएम कोर्ट ने पिछले दिनों ख़ारिज कर दिया था लेकिन हाईकोर्ट ने इसे दोबारा शुरू करने का आदेश दिया है.
साल 1999 में महराजगंज के पचरुखिया में क़ब्रिस्तान और श्मशान की ज़मीन को लेकर हुए विवाद के मामले में गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ समेत कुछ लोगों के ख़िलाफ़ महराजगंज कोतवाली में केस दर्ज किया था.
इस विवाद में समाजवादी पार्टी की नेता तलत अजीज़ के सुरक्षा गार्ड और पुलिस कांस्टेबल सत्यप्रकाश यादव की गोली लगने से मौत हो गई थी.
इस मामले में तलत अजीज़ ने योगी और उनके साथियों के ख़िलाफ़ 302, 307 समेत आईपीसी की कई धाराओं में एफ़आईआर दर्ज कराई थी जबकि बाद में महराजगंज कोतवाली के तत्कालीन एसओ बीके श्रीवास्तव ने भी योगी और 21 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था.
वहीं, इस मामले में तीसरी एफ़आईआर तत्कालीन सांसद और मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर से तलत अजीज़ और उनके साथियों के ख़िलाफ़ दर्ज कराई गई थी जिसमें तलत अजीज़ और उनके साथियों पर योगी के काफ़िले पर हमला करने का आरोप लगाया गया था.
राज्य की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराई थी जिसने अंतिम रिपोर्ट लगाकर बाद में मामले को बंद कर दिया था.
मामले की याचिकाकर्ता और घटना की प्रत्यक्षदर्शी रहीं तलत अजीज़ ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "ये एक बहुत ही छोटा मामला था जो कि प्रधान स्तर पर ही सुलझ सकता था लेकिन कुछ लोगों ने इसे इतना बड़ा बना दिया. दरअसल, 10 फ़रवरी 1999 को हम लोग सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे और सड़क जाम कर रहे थे. तभी कुछ लोगों ने मुझसे उस पचरुखिया गांव चलने की अपील की जहां कब्रिस्तान को लेकर चार दिन पहले विवाद हुआ था."
तलत अजीज़ बताती हैं कि वहीं योगी आदित्यनाथ अपने तमाम समर्थकों के साथ पहुंच गए और तभी कुछ लोगों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी.
उनके मुताबिक़, फ़ायरिंग काफ़ी देर तक चलती रही और लोग इधर-उधर जान बचाकर भागे.
वह कहती हैं, "इसी दौरान मुझे लक्ष्य करके किसी ने गोली चलाई लेकिन सत्य प्रकाश यादव जो कि मेरी सुरक्षा में तैनात था, वो आगे पड़ गया और गोली लगने से उसकी तत्काल मौत हो गई."
तलत अजीज़ के मुताबिक़, घटना की शुरुआत क़ब्रिस्तान में स्थित एक पीपल के पेड़ से हुई.
वो कहती हैं,"क़ब्रिस्तान में एक पीपल का पेड़ था. उसे कुछ मुसलमानों ने इसलिए काट दिया क्योंकि वो सूख गया था. इसे लेकर कुछ हिन्दू लोग भड़क गए और फिर ग़ुस्से में कई क़ब्रों के पास पीपल के पेड़ लगा दिए गए. इसके चलते वहां बड़ा सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया था. कई दिनों तक पीएसी तैनात रही."
ये मामला क़रीब 19 साल तक महराजगंज की सीजेएम कोर्ट में चला और इसी साल 13 मार्च को सीजेएम कोर्ट ने इसे ख़ारिज कर दिया.
तलत अजीज़ ने इस फ़ैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी और फिर उच्च न्यायालय ने सीजेएम कोर्ट के फ़ैसले को निरस्त करते हुए मामले की महराजगंज के ज़िला एवं सत्र न्यायालय में सुनवाई के निर्देश दिए.
योगी आदित्यनाथ और कुछ अन्य लोगों को इसी मामले में नोटिस भेजा गया है.
सिर्फ़ हम और आप ही नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कॉल ड्रॉप से परेशान हैं.
यह ख़बरटाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी है. पीएम मोदी ने अपना ये अनुभव मंत्रालयों के सचिवों से बातचीत के दौरान शेयर किया.
उन्होंने इस बैठक में ये कहा कि दिल्ली एयरपोर्ट से अपने आधिकारिक आवास पर जाते वक़्त वो किसी से फ़ोन पर बात कर रहे थे और बार-बार उनकी कॉल ड्रॉप होती रहीं.
इसके बाद उन्होंने दूरसंचार मंत्रालय को टेलीकॉम कंपनियों से मिलकर समस्या का समाधान ढूंढ़ने का निर्देश दिया. इस बैठक में भारत की दूरसंचार सचिव अरुणा सुंदरराजन भी शामिल थीं.
कॉल ड्रॉप की शिक़ायत क़रीब हर मोबाइल फ़ोन यूज़र को रहती है.
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका द्वारा ईरान पर लगाई पाबंदियों की वजह से उसे भारत जैसे बड़े तेल के ग्राहक को खोना पड़ सकता है.
अख़बार इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के हवाले से लिखता है कि भारत ने नवंबर महीने में ईरान से कच्चा तेल मंगाने का ऑर्डर अब तक नहीं दिया है.
यह जानकारी दोनों कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने दी है.
अख़बार के मुताबिक तेल उद्योग के एक बड़े अधिकारी ने कहा है कि नायरा एनर्जी भी इसी नक्शेकदम पर चल रही है और उसकी भी ईरान से तेल ख़रीदने की कोई योजना नहीं है.
चीन के बाद भारत ईरान का दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. अमरीका द्वारा ईरान पर पाबंदियां लगाने के भारत ने कहा था कि वो किसी दूसरे देश के दबाव में अपने फ़ैसले नहीं ले सकता.
हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त राष्ट्र का पर्यारवण से सम्बन्धित सर्वोच्च पुरस्कार से नवाजा गया है.
इसे 'चैंपियंस ऑफ़ द अर्थ अवॉर्ड' कहा जाता है. यह पुरस्कार पर्यावरण के मोर्चे पर उल्लेखनीय काम करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को दिया जाता है.
यह पुरस्कार उन्हें इंटरनेशनल सोलर अलाएंस के नेतृत्व और साल 2022 तक भारत में प्लास्टिक का इस्तेमाल ख़त्म करने का वादा करने के लिए दिया गया है.
पीएम मोदी के अलावा यह पुरस्कार फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों समेत चार अन्य संस्थाओं और व्यक्तियों को दिया गया है.
इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर के मुताबिक पूर्व राज्यसभा सांसद और समाजवादी पार्टी के नेता वीरपाल यादव पर कांवड़ियों और हिंदू देवी-देवताओं के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में एफ़आई दर्ज की गई है.
वीरपाल यादव ने कहा था, "कांवड़ियें ऐसी भगवा टीशर्ट पहनकर निकलते हैं जिन पर आगे की तरफ़ मोदी की तस्वीर होती है और पीछे की तरफ़ योगी की. उनके एक हाथ में तलवार होती है और दूसरे में शराब की बोतल. वो ये कहते हुए नाचते हैं कि अखिलेश यादव ने कांवड़ यात्रा में डीजे पर रोक लगा दी और योगी ने इसे फिर से शुरू करवा दिया. मुझे समझ में नहीं आता कि इन सब से भगवान शिव कैसे ख़ुश हो सकते हैं.''
उत्तर प्रदेश के मेरठ में मुसलमान लड़के के साथ दिखने पर पुलिस की पिटाई झेलने वाली लड़की का कहना है कि पुलिस ने उसे उसके दोस्त पर बलात्कार का मामला दर्ज कराने का दबाव बनाया.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ पुलिस ने लड़की से कहा कि अगर वो मुसलमान लड़के पर रेप का केस करती है तो वो उसे जाने देंगे.
ड़की ने अख़बार को दिए इंटरव्यू में कहा, "मैं पुलिस स्टेशन में बैठी अपने घरवालों का इंतज़ार कर रही थी और पुलिसवाले मुझ पर मेरे दोस्त के ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला दर्ज कराने का दबाव बना रहे थे. उन्होंने मेरे घरवालों को भी यही सलाह दी.''
इस बारे में पूछे जाने पर मेरठ के एसपी (सिटी) ने कहा कि उनकी जानकारी में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है. उन्होंने कहा कि अगर लड़की पर वाक़ई दबाव डाला गया तो ऐसा करने वाले पर उचित कार्रवाई की जाएगी.
मंगलवार को सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया था, जिसमें एक महिला कॉन्स्टेबल लड़की को पीटते हुए उसे मुस्लिम पार्टनर चुनने के लिए गालियां दे रही थी.

Monday, September 17, 2018

中莫双边协议能助莫桑比克实现可持续林业吗?

莫桑比克恢宏壮丽的森林正遭受着规模同样宏大的威胁。和世界上很多森林一样,法律薄弱、腐败猖獗以及非法和过度采伐正在摧毁这一宝贵的资源。

但正如我们在环境与发展国际研究所今天发布的新报告《莫桑比克森林里的中国:生计和可持续性问题及进展综述》中所展示的那样,有了最大贸易伙伴中国的支持,莫桑比克有机会扭转这一局势。通过法规,鼓励中国企业及其在莫桑比克的合作伙伴在该国投资高价值加工产业,以及加强执法对于制止这种破坏至关重要。

令人震惊的是,莫桑比克每年有21.9万公顷的森林遭到砍伐——约每分钟1万平方米。

这不仅会对生物多样性以及减轻气候变化影响的工作产生严重影响,而且关系到莫桑比克的经济状况,有损其可持续发展和造福民众的能力。

更强大的伙伴关系

莫桑比克93%的木材出口至中国,因此后者在莫桑比克森林未来的发展方向方面发挥着关键作用。6月,两国签署了一项谅解备忘录,同意合力制止森林破坏,让莫桑比克民众与中国投资者一道共享林业生产带来的益处。

这一举动是帮助拯救这些森林的关键机会。通过签署谅解备忘录,莫桑比克可以成为其他国家学习如何发展可行的、基于可持续采购的林业产品体系的榜样。而中国承诺在莫桑比克投资建立木材加工厂,将有助于结束当地对华原木出口的历史,并且可以引进现代高效的加工设施,减少浪费,充分利用木材,为当地人创造就业机会,增加当地急需的税收收入。

中国驻莫桑比克的企业已经率先采取了行动,其中一家是森林先生有限公司( .)。2017年,我曾见过公司的首席执行官郑飞。他15年前来到莫桑比克,用他的话说是“爱上了当地的树木”。从他的身上,我们看到热爱森林和用森林做生意是如何二者兼得的。他已经建立了可持续经营实践,采用了中国政府关于良好林业的指导方针,支持相关社区参与推广非木材类的林业产品。但其他中国投资者还需采取更多行动。结非法采伐

协议还希望两国政府合作建立一个双边审核系统,从而打击非法采伐,加强审理的可持续管理。正如我们的报告所示,重要的是,审核系统必须包括开发一个基于互联网和条形码的电子木材追踪系统,可以实现整条供应链的实时数据录入和检查。这对打击腐败、保护森林至关重要。

从莫桑比克流出的木材量往往远高于官方记录的数字。根据联合国商品贸易统计数据库,2013年莫桑比克报告的对华出口木材量为280796立方米,但中国方面记录的进口数量却是这个数字的两倍还多,达601919立方米。

检查和监测工作也需要改进。根据莫桑比克森林专家的计算,为了执行新的木材追踪系统,需要将森林检查员的人数从630名增加至1800名。

长期管理

莫桑比克还需对森林管理和森林法进行重大改革。其中一个问题是如何分配采伐林地,因为普通采伐许可证这种管理办法破坏性尤其大。

普通许可证授权的采伐面积最多为1万公顷,每5年更新一次。但有些许可证的授权面积达到了6万公顷,明显超出限额。由于许可期限短,企业不会等待较小的树木成熟以供未来砍伐,所以森林中的珍贵树种容易一并遭到集体砍伐。取消普通许可证,规定所有特许经营期限为50年,对企业遵守可持续管理计划的情况定期进行评估等必须成为标准。

除了确保谅解备忘录中有关在莫桑比克建设工业规模特许经营权配套加工设施的内容得到有效落实之外,该国的森林法还需将商业林权授予已经拥有土地权的林业社区,其中可以包括建立新的社区森林特许经营权,条件是社区要保持森林的完整。社区有权通过将木材销售给第三方来赚钱,从而调动他们保护森林的积极性。

为了我们的子孙后代,必须采取行动拯救莫桑比克的森林。这一点毋庸置疑。中莫双方必须共同努力,使之成为现实。

Monday, September 3, 2018

'स्त्री': एक आकर्षक वेश्या जो पुरुषों को नग्न तो करती थी मगर उनका रेप नहीं करती


सवाल बड़ा वाजिब है. पुरुष तो हुए भूत. भूत अंकल. भूतनाथ. ‘चमत्कार’ वाला मार्को. दिल के अच्छे, लोगों की मदद करने वाले. मगर औरतें ठहरी चुड़ैल. पाएं तो कच्चा नोच लें. मेनका की तरह भोले-भाले पुरुष को रिझाकर उसका काम लगा दें. चुड़ैलें दूसरों का भला करने नहीं आतीं. वे तो बदला लेने आती हैं. इसीलिए हमारे कल्चर में उन्हें मार डाला जाता है, जला दिया जाता है.
विच हंटिंग का पक्का डाटा मिलना मुश्किल है. मगर नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो का एक पुराना डाटा बताता है कि 1991 से लेकर 2010 के बीच लगभग 1700 औरतों को चुड़ैल बताकर मारा गया था. उनके नाखून बड़े थे? वो रात में लोगों का खून पीने निकलती थीं? नहीं. उनकी गलतियां छोटी थीं. कभी अपनी औकात से ऊपर का कोई काम कर दिया था. कभी ऊंची जात वालों की मर्यादा को ठेस पहुंचा दी थी.
पुस्तक भंडार वाले रुद्र (पंकज त्रिपाठी) ने बताया था कि गांव में एक ‘आकर्सक बेस्या’ हुआ करती थी. उसे प्रेम हो गया. ऐसा नहीं है कि वेश्या को प्रेम नहीं हो सकता. मगर हम लोगों को लगता है कि जो पहले ही दसियों मर्दों के साथ सो चुकी है, उसके प्रेम का क्या मोल? प्रेम करने की इजाज़त असल में हर औरत को है. मगर उसे ज़ाहिर करने की नहीं. क्योंकि जहां औरत मुखर होने लगती है, वहीं से उसकी चुड़ैल बनने की प्रक्रिया चालू हो जाती है.
एक तो वेश्या, ऊपर से प्रेम! इसलिए उसे मार डाला गया. पर वो प्रेम की तलाश में वापस आई. चुड़ैल जो थी. चुड़ैलें कभी पुरुषवादी समाज के नियमों से नहीं चलतीं, इसीलिए वे चुड़ैलें होती हैं. वो चुड़ैल थी इसलिए उसे मर्द चाहिए था या उसे मर्द चाहिए था इसलिए वो चुड़ैल थी, ये कह पाना मुश्किल है. असल में हमारे लिए दोनों बातों के मायने एक ही होते हैं.
पुरुषवादी समाज को लगा कि स्त्री सुहागरात की भूखी है. एक बार एक पुरुष उससे यौन संबंध स्थापित कर लेगा तो वो चली जाएगी. पर वो तो सुहागरात की सेज तक पहुंची ही नहीं!
हर मुखर औरत को सेक्स चाहिए हो, जरूरी तो नहीं. महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली औरतों की जब कोई नहीं सुनता, उन्हें नग्न होकर विरोध प्रदर्शन करते देखा गया है. क्या करें, वे नग्न न हों तो उनकी सुनेगा कौन? जबतक नग्न लड़कियों के सड़क पर घूमने से पुरुषवाद की मर्यादा को ठेस न पहुंचे, तबतक भला समाज क्यों सुनेगा उनकी? देश की पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल मानबी बंदोपाध्याय से एक संवाद हो रहा था. उन्होंने कहा – “जानते हैं आप, हम हिजड़े इतना लाली-पौडर लगाकार क्यों निकलती हैं? ताकि आप हमें नोटिस करें.” जो स्त्री गांव के पुरुषों को डराकर, नग्न कर ले न जाती, कोई उसपर ध्यान क्यों देता? जो कोई उससे डरता नहीं, उसकी बात कैसे मानता?
औरतों को यौनिकता से अलग कर देख पाना हमारे लिए आज भी असंभव है. इसलिए पुरुषों का धन लुटता है. और औरतों की इज्जत. ‘राज़’ फिल्म की भूतनी हो, ‘भूल भुलैय्या’ की मंजुलिका या फिर ‘स्त्री’ की स्त्री, सब प्रेम की मारी थीं. स्त्री ये कहती है कि आप उसकी यौनिकता को कब तक कैद कर रखेंगे? उसे मार डालेंगे? पर वो तो मरेगी नहीं. हर औरत पुरुषवाद की चौकीदार या उसकी कैदी नहीं बन सकती. कुछ उसमें सेंध मार अपना हिस्सा लेने आती रहेंगी. जिस दिन एक साथ आएंगी, ये प्राचीर ढह जाएगी.
उसी दिन की एक झलक स्त्री में मिलती है. पूरा गांव खौफ में है. पुरुष साड़ी पहनकर, डर-डरकर निकल रहे हैं. घर पे अकेले रहते डर लगता है. रात को बाहर निकलते डर लगता है. पत्नियों के पल्लुओं में छिपे जा रहे हैं. कमाल की बात है कि औरतें सैकड़ों साल से इसी तरह जी रही हैं क्योंकि उन्हें ‘पुरुष’ का डर है. ये पुरुष उन्हें या तो नुकसान पहुंचाएगा या उनकी रक्षा करेगा. कैसा विरोधाभास है कि पुरुषवादी समाज में पुरुष ही औरत को मार भी रहा है और बचा भी रहा है. रेप भी कर रहा है और राखी भी बंधवा रहा है. अंत में चंदेरी में यही हुआ जो हमारे समाज में सैकड़ों वर्षों से हो रहा है. बस लैंगिक रूप से उलट. नुकसान पहुंचाने वाली स्त्री को पुरुषों ने अपना रक्षक बना लिया. ‘ओ स्त्री, रक्षा करना.’
‘स्त्री किसी को बिना इजाज़त नहीं ले जाती है. वो स्त्री है, पुरुष नहीं.’
हिंसा स्त्री की प्रवृत्ति नहीं थी. वो जिस भी पुरुष को ले गई, सब जीवित वापस आए. वो पुरुषों का यौन शोषण नहीं करना चाह रही थी. वो अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाना चाह रही थी. वो भूत न होती तो उसकी मौजूदगी पता नहीं पड़ती. जैसे हमारे घर में बहुओं, बुढ़ाती माओं की मौजूदगी के मायने नहीं होते. गैर-मौजूदगी के होते हैं. उनकी इच्छाएं क्या हैं, उन्हें फल कौन सा पसंद है, फिल्म कौन सी पसंद है, उनका पसंदीदा रंग क्या है, कोई नहीं जानता. खाना ख़त्म हो जाता है तो वो क्या खाती हैं, कोई नहीं जानता. पैड नहीं होते तो पीरियड के दौरान क्या करती हैं, कोई नहीं जानता. बुखार में भी काम कर लेती हैं. पेट दर्द में भी. प्रेगनेंसी तक की जानकारी किसी को तबतक नहीं पड़ती, जबतक कोई दबी आवाज़ में बता न दे.
स्त्री कोई आम स्त्री नहीं, उसे वही चाहिए जिसका उसे इंतजार है. एक वेश्या के पुत्र का. एक ऐसा पुरुष जो उसकी आंखों में आंखें डालकर उसे प्रेम से देखे. उसे अपने बराबर समझे, अपनी कुंठा मिटाने का सामान नहीं. विक्की से स्त्री को प्रेम मिला, शायद इसलिए क्योंकि वो वेश्या का बेटा था. एक ऐसी औरत का बेटा जिसको स्त्री की ही तरह कभी इज्ज़त नहीं मिली. विक्की का मानना था कि स्त्री को खंजर मारकर उसे ख़त्म नहीं करना चाहिए. उसके पिता ने भी तो वेश्या से प्रेम किया था.
बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘डिसेंट’ यानी असहमति समाज का सेफ्टी वाल्व है. वरना प्रेशर कुकर सा ये समाज फट जाएगा. स्त्री का रोज़ का आना जाना नहीं था. वो मेले के समय आती थी. मेले भद्र समाज का सेफ्टी वाल्व होते हैं. वहां जाति के भेद नहीं होते. लिंग के भेद नहीं होते. सब रंग-बिरंगा होता है. रूसी फिलॉसफ़र मिखाइल बाख्तिन इसे कार्नीवलेस्क (कार्निवल का शाब्दिक अर्थ होता है ‘मेला’) कह गए हैं. उनके मुताबिक़ ये मेले सेफ्टी वाल्व होते हैं क्योंकि इसमें हंसने, मजाक उड़ाने, अपनी औकात से बाहर का काम करने की छूट मिलती है, भले ही चार दिन के लिए ही क्यों न सही. स्त्री के ये चार दिन पुरुषवाद को उलट देते हैं.
ऐसा नहीं है कि बाकी के साल महिलाओं पर अत्याचार नहीं होता. मगर उन चार दिनों तक महिलाओं को कोई परेशान नहीं करता. इन चार दिनों के लिए स्त्री मृत होकर भी जीवित होती है. और डरने की बारी पुरुष की होती है. आप कहेंगे क्या पुरुष को डराकर पुरुषवाद ख़त्म होगा? नहीं, शायद नहीं. पर कॉमेडियन हैना गैड्स्बी अपने बहुचर्चित शो नैनेट में कह गई हैं: