सवाल बड़ा वाजिब है. पुरुष तो हुए भूत. भूत अंकल. भूतनाथ. ‘चमत्कार’ वाला मार्को. दिल के अच्छे, लोगों की मदद करने वाले. मगर औरतें ठहरी चुड़ैल. पाएं तो कच्चा नोच लें. मेनका की तरह भोले-भाले पुरुष को रिझाकर उसका काम लगा दें. चुड़ैलें दूसरों का भला करने नहीं आतीं. वे तो बदला लेने आती हैं. इसीलिए हमारे कल्चर में उन्हें मार डाला जाता है, जला दिया जाता है.
विच हंटिंग का पक्का डाटा मिलना मुश्किल है. मगर नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो का एक पुराना डाटा बताता है कि 1991 से लेकर 2010 के बीच लगभग 1700 औरतों को चुड़ैल बताकर मारा गया था. उनके नाखून बड़े थे? वो रात में लोगों का खून पीने निकलती थीं? नहीं. उनकी गलतियां छोटी थीं. कभी अपनी औकात से ऊपर का कोई काम कर दिया था. कभी ऊंची जात वालों की मर्यादा को ठेस पहुंचा दी थी.
पुस्तक भंडार वाले रुद्र (पंकज त्रिपाठी) ने बताया था कि गांव में एक ‘आकर्सक बेस्या’ हुआ करती थी. उसे प्रेम हो गया. ऐसा नहीं है कि वेश्या को प्रेम नहीं हो सकता. मगर हम लोगों को लगता है कि जो पहले ही दसियों मर्दों के साथ सो चुकी है, उसके प्रेम का क्या मोल? प्रेम करने की इजाज़त असल में हर औरत को है. मगर उसे ज़ाहिर करने की नहीं. क्योंकि जहां औरत मुखर होने लगती है, वहीं से उसकी चुड़ैल बनने की प्रक्रिया चालू हो जाती है.
एक तो वेश्या, ऊपर से प्रेम! इसलिए उसे मार डाला गया. पर वो प्रेम की तलाश में वापस आई. चुड़ैल जो थी. चुड़ैलें कभी पुरुषवादी समाज के नियमों से नहीं चलतीं, इसीलिए वे चुड़ैलें होती हैं. वो चुड़ैल थी इसलिए उसे मर्द चाहिए था या उसे मर्द चाहिए था इसलिए वो चुड़ैल थी, ये कह पाना मुश्किल है. असल में हमारे लिए दोनों बातों के मायने एक ही होते हैं.
पुरुषवादी समाज को लगा कि स्त्री सुहागरात की भूखी है. एक बार एक पुरुष उससे यौन संबंध स्थापित कर लेगा तो वो चली जाएगी. पर वो तो सुहागरात की सेज तक पहुंची ही नहीं!
हर मुखर औरत को सेक्स चाहिए हो, जरूरी तो नहीं. महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली औरतों की जब कोई नहीं सुनता, उन्हें नग्न होकर विरोध प्रदर्शन करते देखा गया है. क्या करें, वे नग्न न हों तो उनकी सुनेगा कौन? जबतक नग्न लड़कियों के सड़क पर घूमने से पुरुषवाद की मर्यादा को ठेस न पहुंचे, तबतक भला समाज क्यों सुनेगा उनकी? देश की पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल मानबी बंदोपाध्याय से एक संवाद हो रहा था. उन्होंने कहा – “जानते हैं आप, हम हिजड़े इतना लाली-पौडर लगाकार क्यों निकलती हैं? ताकि आप हमें नोटिस करें.” जो स्त्री गांव के पुरुषों को डराकर, नग्न कर ले न जाती, कोई उसपर ध्यान क्यों देता? जो कोई उससे डरता नहीं, उसकी बात कैसे मानता?
औरतों को यौनिकता से अलग कर देख पाना हमारे लिए आज भी असंभव है. इसलिए पुरुषों का धन लुटता है. और औरतों की इज्जत. ‘राज़’ फिल्म की भूतनी हो, ‘भूल भुलैय्या’ की मंजुलिका या फिर ‘स्त्री’ की स्त्री, सब प्रेम की मारी थीं. स्त्री ये कहती है कि आप उसकी यौनिकता को कब तक कैद कर रखेंगे? उसे मार डालेंगे? पर वो तो मरेगी नहीं. हर औरत पुरुषवाद की चौकीदार या उसकी कैदी नहीं बन सकती. कुछ उसमें सेंध मार अपना हिस्सा लेने आती रहेंगी. जिस दिन एक साथ आएंगी, ये प्राचीर ढह जाएगी.
उसी दिन की एक झलक स्त्री में मिलती है. पूरा गांव खौफ में है. पुरुष साड़ी पहनकर, डर-डरकर निकल रहे हैं. घर पे अकेले रहते डर लगता है. रात को बाहर निकलते डर लगता है. पत्नियों के पल्लुओं में छिपे जा रहे हैं. कमाल की बात है कि औरतें सैकड़ों साल से इसी तरह जी रही हैं क्योंकि उन्हें ‘पुरुष’ का डर है. ये पुरुष उन्हें या तो नुकसान पहुंचाएगा या उनकी रक्षा करेगा. कैसा विरोधाभास है कि पुरुषवादी समाज में पुरुष ही औरत को मार भी रहा है और बचा भी रहा है. रेप भी कर रहा है और राखी भी बंधवा रहा है. अंत में चंदेरी में यही हुआ जो हमारे समाज में सैकड़ों वर्षों से हो रहा है. बस लैंगिक रूप से उलट. नुकसान पहुंचाने वाली स्त्री को पुरुषों ने अपना रक्षक बना लिया. ‘ओ स्त्री, रक्षा करना.’
‘स्त्री किसी को बिना इजाज़त नहीं ले जाती है. वो स्त्री है, पुरुष नहीं.’
हिंसा स्त्री की प्रवृत्ति नहीं थी. वो जिस भी पुरुष को ले गई, सब जीवित वापस आए. वो पुरुषों का यौन शोषण नहीं करना चाह रही थी. वो अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाना चाह रही थी. वो भूत न होती तो उसकी मौजूदगी पता नहीं पड़ती. जैसे हमारे घर में बहुओं, बुढ़ाती माओं की मौजूदगी के मायने नहीं होते. गैर-मौजूदगी के होते हैं. उनकी इच्छाएं क्या हैं, उन्हें फल कौन सा पसंद है, फिल्म कौन सी पसंद है, उनका पसंदीदा रंग क्या है, कोई नहीं जानता. खाना ख़त्म हो जाता है तो वो क्या खाती हैं, कोई नहीं जानता. पैड नहीं होते तो पीरियड के दौरान क्या करती हैं, कोई नहीं जानता. बुखार में भी काम कर लेती हैं. पेट दर्द में भी. प्रेगनेंसी तक की जानकारी किसी को तबतक नहीं पड़ती, जबतक कोई दबी आवाज़ में बता न दे.
स्त्री कोई आम स्त्री नहीं, उसे वही चाहिए जिसका उसे इंतजार है. एक वेश्या के पुत्र का. एक ऐसा पुरुष जो उसकी आंखों में आंखें डालकर उसे प्रेम से देखे. उसे अपने बराबर समझे, अपनी कुंठा मिटाने का सामान नहीं. विक्की से स्त्री को प्रेम मिला, शायद इसलिए क्योंकि वो वेश्या का बेटा था. एक ऐसी औरत का बेटा जिसको स्त्री की ही तरह कभी इज्ज़त नहीं मिली. विक्की का मानना था कि स्त्री को खंजर मारकर उसे ख़त्म नहीं करना चाहिए. उसके पिता ने भी तो वेश्या से प्रेम किया था.
बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘डिसेंट’ यानी असहमति समाज का सेफ्टी वाल्व है. वरना प्रेशर कुकर सा ये समाज फट जाएगा. स्त्री का रोज़ का आना जाना नहीं था. वो मेले के समय आती थी. मेले भद्र समाज का सेफ्टी वाल्व होते हैं. वहां जाति के भेद नहीं होते. लिंग के भेद नहीं होते. सब रंग-बिरंगा होता है. रूसी फिलॉसफ़र मिखाइल बाख्तिन इसे कार्नीवलेस्क (कार्निवल का शाब्दिक अर्थ होता है ‘मेला’) कह गए हैं. उनके मुताबिक़ ये मेले सेफ्टी वाल्व होते हैं क्योंकि इसमें हंसने, मजाक उड़ाने, अपनी औकात से बाहर का काम करने की छूट मिलती है, भले ही चार दिन के लिए ही क्यों न सही. स्त्री के ये चार दिन पुरुषवाद को उलट देते हैं.
ऐसा नहीं है कि बाकी के साल महिलाओं पर अत्याचार नहीं होता. मगर उन चार दिनों तक महिलाओं को कोई परेशान नहीं करता. इन चार दिनों के लिए स्त्री मृत होकर भी जीवित होती है. और डरने की बारी पुरुष की होती है. आप कहेंगे क्या पुरुष को डराकर पुरुषवाद ख़त्म होगा? नहीं, शायद नहीं. पर कॉमेडियन हैना गैड्स्बी अपने बहुचर्चित शो नैनेट में कह गई हैं:
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