Friday, August 31, 2018

नज़रियाः विपक्षी गठबंधन से सीधी लड़ाई टालने को बनी शिवपाल की पार्टी

मुलायम सिंह यादव के परिवार में बिखराव पहले से ही था, अब उनकी समाजवादी पार्टी में भी बिखराव शुरू हो गया. उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने सपा से नाता तोड़कर बुधवार को समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा बनाने की घोषणा कर दी.
उनका कहना था कि वे पिछले डेढ़ साल से इंतजार कर रहे थे कि मौजूदा पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव उन्हें उनके क़द के मुताबिक कोई ज़िम्मेदारी सौंपेंगे.
लेकिन जब अखिलेश ने अपने चाचा की सुध लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई तो शिवपाल सिंह ने सपा छोड़कर अपनी अलग पार्टी बना ली.
उनका कहना था कि सपा के नेतृत्व के अहंकारी रवैये से कई समाजवादी नेता उपेक्षित महसूस कर रहे थे. अब वे सभी शिवपाल के मोर्चे में शामिल हो जाएंगे.
ख़ुद मुलायम सिंह यादव भी अखिलेश द्वारा समाजवादी पार्टी पर 'क़ब्ज़ा' किए जाने से नाराज़ हैं. वे अपने क़रीबियों के सामने कई बार अखिलेश के प्रति अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुके हैं. संभव है कि वे शिवपाल के मोर्चे में शामिल हो जाएं. साथ हीपा में 1996 तक मुलायम सिंह के बाद शिवपाल दूसरे सबसे क़द्दावर नेता थे. यदि अखिलेश मुख्यमंत्री के पद पर बैठकर भी ख़ुद

 को कमज़ोर पाते थे तो उसकी बड़ी वजह शिवपाल का ताक़तवर होना था. अखिलेश सरकार में शिवपाल एक समानांतर सत्ता के केंद्र थे. लेकिन 2016 के अंत में अखिलेश यादव ने शिवपाल को न सिर्फ मंत्रिमंडल से हटा दिया बल्कि पार्टी से भी निष्कासित कर दिया था.
साथ ही अमर सिंह को भी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. बाद में मुलायम सिंह के दख़ल से बीच का रास्ता निकाला गया लेकिन अखिलेश ने इस बीच मुलायम सिंह को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से हटाकर सपा के संगठन पर पूरी तरह क़ब्ज़ा कर लिया. तभी से अमर सिंह और शिवपाल, अखिलेश यादव से अलग राह तलाश कर रहे थे.
शिवपाल का इरादा अखिलेश से नाराज़ सभी नेताओं को एक मंच पर लाना है.
इस पूरी प्रक्रिया में दो अहम बातें पीछे छूट गई हैं. पहली कि पिछले कुछ महीनों में शिवपाल यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कई बार मिले.
दूसरी कि सपा से निष्कासित राज्यसभा सांसद अमर सिंह ने मंगलवार को लखनऊ में मीडिया से कहा कि उन्होंने शिवपाल की मुलाकात बीजेपी के

वरिष्ठ नेताओं से रखी थी लेकिन शिवपाल उस बैठक में आए ही नहीं.
यानी शिवपाल के फैसले के पीछे जिन लोगों का हाथ है उनमें अमर सिंह और योगी आदित्यनाथ प्रमुख हैं. अखिलेश के करीबी नेता खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि शिवपाल तो बीजेपी के हाथ की कठपुतली बन गए हैं और अब उनके जीवन का एकमात्र ध्येय सपा-बसपा-कांग्रेस के तालमेल को तोड़ना है. यदि वे इसे तोड़ने में नाकाम रहते हैं तो इसे ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचा दें.
दरअसल, विपक्षी महागंठन की चर्चा ने बीजेपी के होश उड़ा दिए हैं. साढ़े चार साल सरकार चलाने के बाद उसे समझ आ गया है कि उसके ख़िलाफ़ एंटी-इनकमबेंसी बहुत ज्यादा है. नोटबंदी से लेकर राफ़ेल डील पर उसके पास विपक्षी हमलों का कोई जवाब नहीं है. वहीं दलित और पिछड़ी जातियाँ भी उससे नाराज हैं.
ऐसे में, जाति समीकरणों के साथ ही चुनावी गणित में

 भी बीजेपी और उसके सहयोगी इस महागठबंधन के सामने सीधी लड़ाई में कहीं नहीं ठहरते हैं. इसीलिए बीजेपी
यह भारतीय जनता पार्टी के 'डिमॉलिशन स्क्वॉड' है. फ़िलहाल इसने उत्तर प्रदेश में अपना काम करना शुरु कर ही दिया. धीरे-धीरे यह और प्रदेशों में भी सक्रिय होगा. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से निकाले गए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी लड़ाई को त्रिकोणीय बना रहे हैं तो तमिलनाडु में बीजेपी

 को डीएमके से तालमेल की उम्मीद थी.
लेकिन मंगलवार को आए स्टालिन के सख्त बयान के बाद बीजेपी की उम्मीदें अन्ना डीएमके के दिनाकरन गुट पर टिक गई हैं. साथ ही कमल हासन, विजयकांत और रजनीकांत की पार्टियाँ मिलकर चुनाव को बहुकोणीय बना देंगी.
इसी तरह उसकी उम्मीदें ओडिशा में बीजू जनता दल, आंध्र प्रदेश में तेलुगू देसम पार्टी और तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ तालमेल की है - यदि चुनाव पूर्व संभव न हो, तो चुनाव नतीजे आने के बाद सही.
यही वह तरीक़ा है जिससे एंटी-इनकमबेंसी के चलते कम होने

 वाली सीटों की भरपाई हो सकती है. पूरी न हो तो आंशिक ही सही. एनडीए के पास आज 333 सीटें हैं. यानी बहुमत से 60 सीटें ज्यादा. अगर 2019 के चुनाव में वह बहुमत से कुछ दूर रह जाती है तो उसे उम्मीद है कि उसे नए सहयोगी मिलने में दिक़्क़त नहीं होगी. शिवपाल की पार्टी को प्रायोजित करना, उसी प्रयास का पहला क़दम है.
(अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता से बातचीत पर आधारित)
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
चाहती है कि उसे विपक्ष का सीधा मुकाबला न करना पड़े और लड़ाई कम से कम त्रिकोणीय जरूर हो.

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